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बालकांड दोहा 339

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चौपाई :बहुबिधि भूप सुता समुझाईं। नारिधरमु कुलरीति सिखाईं॥दासीं दास दिए बहुतेरे। सुचि सेवक जे प्रिय सिय केरे॥1॥ भावार्थ:- राजा ने पुत्रियों को बहुत प्रकार से समझाया और उन्हें स्त्रियों का धर्म और कुल की रीति सिखाई। बहुत से दासी-

बालकांड दोहा 338

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चौपाई :सुक सारिका जानकी ज्याए। कनक पिंजरन्हि राखि पढ़ाए॥ब्याकुल कहहिं कहाँ बैदेही। सुनि धीरजु परिहरइ न केही॥1॥ भावार्थ:- जानकी ने जिन तोता और मैना को पाल-पोसकर बड़ा किया था और सोने के पिंजड़ों में रखकर पढ़ाया था, वे व्याकुल होकर कह र

बालकांड दोहा 337

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चौपाई :अस कहि रही चरन गहि रानी। प्रेम पंक जनु गिरा समानी॥सुनि सनेहसानी बर बानी। बहुबिधि राम सासु सनमानी॥1॥ भावार्थ:- ऐसा कहकर रानी चरणों को पकड़कर (चुप) रह गईं। मानो उनकी वाणी प्रेम रूपी दलदल में समा गई हो। स्नेह से सनी हुई श्रेष्ठ 

बालकांड दोहा 336

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चौपाई :देखि राम छबि अति अनुरागीं। प्रेमबिबस पुनि पुनि पद लागीं॥रही न लाज प्रीति उर छाई। सहज सनेहु बरनि किमि जाई॥1॥ भावार्थ:- श्री रामचन्द्रजी की छबि देखकर वे प्रेम में अत्यन्त मग्न हो गईं और प्रेम के विशेष वश होकर बार-बार चरणों ल

बालकांड दोहा 335

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चौपाई :चारिउ भाइ सुभायँ सुहाए। नगर नारि नर देखन धाए॥कोउ कह चलन चहत हहिं आजू। कीन्ह बिदेह बिदा कर साजू॥1॥ भावार्थ:- स्वभाव से ही सुंदर चारों भाइयों को देखने के लिए नगर के स्त्री-पुरुष दौड़े। कोई कहता है- आज ये जाना चाहते हैं। विदेह न

बालकांड दोहा 334

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चौपाई :सबु समाजु एहि भाँति बनाई। जनक अवधपुर दीन्ह पठाई॥चलिहि बरात सुनत सब रानीं। बिकल मीनगन जनु लघु पानीं॥1॥ भावार्थ:- इस प्रकार सब सामान सजाकर राजा जनक ने अयोध्यापुरी को भेज दिया। बारात चलेगी, यह सुनते ही सब रानियाँ ऐसी विकल हो 

बालकांड दोहा 333

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चौपाई :पुरबासी सुनि चलिहि बराता। बूझत बिकल परस्पर बाता॥सत्य गवनु सुनि सब बिलखाने। मनहुँ साँझ सरसिज सकुचाने॥1॥ भावार्थ:- जनकपुरवासियों ने सुना कि बारात जाएगी, तब वे व्याकुल होकर एक-दूसरे से बात पूछने लगे। जाना सत्य है, यह सुनकर स

बालकांड दोहा 332

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चौपाई :जनक सनेहु सीलु करतूती। नृपु सब भाँति सराह बिभूती॥दिन उठि बिदा अवधपति मागा। राखहिं जनकु सहित अनुरागा॥1॥ भावार्थ:- राजा दशरथजी जनकजी के स्नेह, शील, करनी और ऐश्वर्य की सब प्रकार से सराहना करते हैं। प्रतिदिन (सबेरे) उठकर अयोध्