अयोध्याकांड दोहा 57
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चौपाई :देव पितर सब तुम्हहि गोसाईं। राखहुँ पलक नयन की नाईं॥अवधि अंबु प्रिय परिजन मीना। तुम्ह करुनाकर धरम धुरीना॥1॥ भावार्थ:- हे गोसाईं! सब देव और पितर तुम्हारी वैसी ही रक्षा करें, जैसे पलकें आँखों की रक्षा करती हैं। तुम्हारे वनवा