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अयोध्याकांड दोहा 73

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चौपाई :मागहु बिदा मातु सन जाई। आवहु बेगि चलहु बन भाई॥मुदित भए सुनि रघुबर बानी। भयउ लाभ बड़ गइ बड़ि हानी॥1॥ भावार्थ:- (और कहा-) हे भाई! जाकर माता से विदा माँग आओ और जल्दी वन को चलो! रघुकुल में श्रेष्ठ श्री रामजी की वाणी सुनकर लक्ष्मणजी आन

अयोध्याकांड दोहा 72

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चौपाई :दीन्हि मोहि सिख नीकि गोसाईं। लागि अगम अपनी कदराईं॥नरबर धीर धरम धुर धारी। निगम नीति कहुँ ते अधिकारी॥1॥ भावार्थ:- हे स्वामी! आपने मुझे सीख तो बड़ी अच्छी दी है, पर मुझे अपनी कायरता से वह मेरे लिए अगम (पहुँच के बाहर) लगी। शास्त्र औ

अयोध्याकांड दोहा 71

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चौपाई :अस जियँ जानि सुनहु सिख भाई। करहु मातु पितु पद सेवकाई॥भवन भरतु रिपुसूदनु नाहीं। राउ बृद्ध मम दुखु मन माहीं॥1॥ भावार्थ:- हे भाई! हृदय में ऐसा जानकर मेरी सीख सुनो और माता-पिता के चरणों की सेवा करो। भरत और शत्रुघ्न घर पर नहीं है

अयोध्याकांड दोहा 70

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चौपाई :समाचार जब लछिमन पाए। ब्याकुल बिलख बदन उठि धाए॥कंप पुलक तन नयन सनीरा। गहे चरन अति प्रेम अधीरा॥1॥ भावार्थ:- जब लक्ष्मणजी ने समाचार पाए, तब वे व्याकुल होकर उदास मुँह उठ दौड़े। शरीर काँप रहा है, रोमांच हो रहा है, नेत्र आँसुओं से भ

अयोध्याकांड दोहा 69

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चौपाई :लखि सनेह कातरि महतारी। बचनु न आव बिकल भइ भारी॥राम प्रबोधु कीन्ह बिधि नाना। समउ सनेहु न जाइ बखाना॥1॥ भावार्थ:- यह देखकर कि माता स्नेह के मारे अधीर हो गई हैं और इतनी अधिक व्याकुल हैं कि मुँह से वचन नहीं निकलता। श्री रामचन्द्र

अयोध्याकांड दोहा 68

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चौपाई :अस कहि सीय बिकल भइ भारी। बचन बियोगु न सकी सँभारी॥देखि दसा रघुपति जियँ जाना। हठि राखें नहिं राखिहि प्राना॥1॥ भावार्थ:- ऐसा कहकर सीताजी बहुत ही व्याकुल हो गईं। वे वचन के वियोग को भी न सम्हाल सकीं। (अर्थात शरीर से वियोग की बात 

अयोध्याकांड दोहा 67

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चौपाई :मोहि मग चलत न होइहि हारी। छिनु छिनु चरन सरोज निहारी॥सबहि भाँति पिय सेवा करिहौं। मारग जनित सकल श्रम हरिहौं॥1॥ भावार्थ:- क्षण-क्षण में आपके चरण कमलों को देखते रहने से मुझे मार्ग चलने में थकावट न होगी। हे प्रियतम! मैं सभी प्रक

अयोध्याकांड दोहा 66

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चौपाई :बनदेबीं बनदेव उदारा। करिहहिं सासु ससुर सम सारा॥कुस किसलय साथरी सुहाई। प्रभु सँग मंजु मनोज तुराई॥1॥ भावार्थ:- उदार हृदय के वनदेवी और वनदेवता ही सास-ससुर के समान मेरी सार-संभार करेंगे और कुशा और पत्तों की सुंदर साथरी (बिछौन