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अयोध्याकांड दोहा 153

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चौपाई :तेहि अवसर रघुबर रुख पाई। केवट पारहि नाव चलाई॥रघुकुलतिलक चले एहि भाँती। देखउँ ठाढ़ कुलिस धरि छाती॥1॥ भावार्थ:- उसी समय श्री रामचन्द्रजी का रुख पाकर केवट ने पार जाने के लिए नाव चला दी। इस प्रकार रघुवंश तिलक श्री रामचन्द्रजी 

अयोध्याकांड दोहा 152

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चौपाई :पुरजन परिजन सकल निहोरी। तात सुनाएहु बिनती मोरी॥सोइ सब भाँति मोर हितकारी। जातें रह नरनाहु सुखारी॥1॥ भावार्थ:- हे तात! सब पुरवासियों और कुटुम्बियों से निहोरा (अनुरोध) करके मेरी विनती सुनाना कि वही मनुष्य मेरा सब प्रकार से ह

अयोध्याकांड दोहा 151

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चौपाई :केवट कीन्हि बहुत सेवकाई। सो जामिनि सिंगरौर गवाँई॥होत प्रात बट छीरु मगावा। जटा मुकुट निज सीस बनावा॥1॥ भावार्थ:- केवट (निषादराज) ने बहुत सेवा की। वह रात सिंगरौर (श्रृंगवेरपुर) में ही बिताई। दूसरे दिन सबेरा होते ही बड़ का दूध म

अयोध्याकाण्ड दोहा 150

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चौपाई :पुनि पुनि पूँछत मंत्रिहि राऊ। प्रियतम सुअन सँदेस सुनाऊ॥करहि सखा सोइ बेगि उपाऊ। रामु लखनु सिय नयन देखाऊ॥1॥ भावार्थ:- राजा बार-बार मंत्री से पूछते हैं- मेरे प्रियतम पुत्रों का संदेसा सुनाओ। हे सखा! तुम तुरंत वही उपाय करो जिस

अयोध्याकाण्ड दोहा 149

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चौपाई :भूप सुमंत्रु लीन्ह उर लाई। बूड़त कछु अधार जनु पाई॥सहित सनेह निकट बैठारी। पूँछत राउ नयन भरि बारी॥1॥ भावार्थ:- राजा ने सुमंत्र को हृदय से लगा लिया। मानो डूबते हुए आदमी को कुछ सहारा मिल गया हो। मंत्री को स्नेह के साथ पास बैठाकर 

अयोध्याकाण्ड दोहा 148

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चौपाई :अति आरति सब पूँछहिं रानी। उतरु न आव बिकल भइ बानी॥सुनइ न श्रवन नयन नहिं सूझा। कहहु कहाँ नृपु तेहि तेहि बूझा॥1॥ भावार्थ:- अत्यन्त आर्त होकर सब रानियाँ पूछती हैं, पर सुमंत्र को कुछ उत्तर नहीं आता, उनकी वाणी विकल हो गई (रुक गई) है

अयोध्याकाण्ड दोहा 147

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चौपाई :एहि बिधि करत पंथ पछितावा। तमसा तीर तुरत रथु आवा॥बिदा किए करि बिनय निषादा। फिरे पायँ परि बिकल बिषादा॥1॥ भावार्थ:- सुमंत्र इस प्रकार मार्ग में पछतावा कर रहे थे, इतने में ही रथ तुरंत तमसा नदी के तट पर आ पहुँचा। मंत्री ने विनय क

अयोध्याकाण्ड दोहा 146

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चौपाई :पुछिहहिं दीन दुखित सब माता। कहब काह मैं तिन्हहि बिधाता।पूछिहि जबहिं लखन महतारी। कहिहउँ कवन सँदेस सुखारी॥1॥ भावार्थ:- जब दीन-दुःखी सब माताएँ पूछेंगी, तब हे विधाता! मैं उन्हें क्या कहूँगा? जब लक्ष्मणजी की माता मुझसे पूछेंग