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अयोध्याकाण्ड दोहा 257

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चौपाई :भरत बचन सुनि देखि सनेहू। सभा सहित मुनि भए बिदेहू॥भरत महा महिमा जलरासी। मुनि मति ठाढ़ि तीर अबला सी॥1॥ भावार्थ:- भरतजी के वचन सुनकर और उनका प्रेम देखकर सारी सभा सहित मुनि वशिष्ठजी विदेह हो गए (किसी को अपने देह की सुधि न रही)। भर

अयोध्याकाण्ड दोहा 256

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चौपाई :तात बात फुरि राम कृपाहीं। राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं॥सकुचउँ तात कहत एक बाता। अरध तजहिं बुध सरबस जाता॥1। भावार्थ:- (वे बोले-) हे तात! बात सत्य है, पर है रामजी की कृपा से ही। राम विमुख को तो स्वप्न में भी सिद्धि नहीं मिलती। हे त

अयोध्याकाण्ड दोहा 255

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चौपाई :सब कहुँ सुखद राम अभिषेकू। मंगल मोद मूल मग एकू॥केहि बिधि अवध चलहिं रघुराऊ। कहहु समुझि सोइ करिअ उपाऊ॥1॥ भावार्थ:- श्री रामजी का राज्याभिषेक सबके लिए सुखदायक है। मंगल और आनंद का मूल यही एक मार्ग है। (अब) श्री रघुनाथजी अयोध्या 

अयोध्याकाण्ड दोहा 254

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चौपाई :बोले मुनिबरु समय समाना। सुनहु सभासद भरत सुजाना॥धरम धुरीन भानुकुल भानू। राजा रामु स्वबस भगवानू॥1॥ भावार्थ:- श्रेष्ठ मुनि वशिष्ठजी समयोचित वचन बोले- हे सभासदों! हे सुजान भरत! सुनो। सूर्यकुल के सूर्य महाराज श्री रामचन्द्र 

अयोध्याकाण्ड दोहा 253

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चौपाई :कीन्हि मातु मिस काल कुचाली। ईति भीति जस पाकत साली॥केहि बिधि होइ राम अभिषेकू। मोहि अवकलत उपाउ न एकू॥1॥ भावार्थ:- (भरतजी सोचते हैं कि) माता के मिस से काल ने कुचाल की है। जैसे धान के पकते समय ईति का भय आ उपस्थित हो। अब श्री रामचन

अयोध्याकाण्ड दोहा 252

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चौपाई :पुर जन नारि मगन अति प्रीती। बासर जाहिं पलक सम बीती॥सीय सासु प्रति बेष बनाई। सादर करइ सरिस सेवकाई॥1॥ भावार्थ:- अयोध्यापुरी के पुरुष और स्त्री सभी प्रेम में अत्यन्त मग्न हो रहे हैं। उनके दिन पल के समान बीत जाते हैं। जितनी सा

अयोध्याकाण्ड दोहा 251

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चौपाई :तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे। सेवा जोगु न भाग हमारे॥देब काह हम तुम्हहि गोसाँई। ईंधनु पात किरात मिताई॥1॥ भावार्थ:- आप प्रिय पाहुने वन में पधारे हैं। आपकी सेवा करने के योग्य हमारे भाग्य नहीं हैं। हे स्वामी! हम आपको क्या दे

अयोध्याकाण्ड दोहा 250

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चौपाई :कोल किरात भिल्ल बनबासी। मधु सुचि सुंदर स्वादु सुधा सी॥भरि भरि परन पुटीं रचि रूरी। कंद मूल फल अंकुर जूरी॥1॥ भावार्थ:- कोल, किरात और भील आदि वन के रहने वाले लोग पवित्र, सुंदर एवं अमृत के समान स्वादिष्ट मधु (शहद) को सुंदर दोने बन