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अयोध्याकाण्ड दोहा 265

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चौपाई :सुर गन सहित सभय सुरराजू। सोचहिं चाहत होन अकाजू॥बनत उपाउ करत कछु नाहीं। राम सरन सब गे मन माहीं॥1॥ भावार्थ:- देवगणों सहित देवराज इन्द्र भयभीत होकर सोचने लगे कि अब बना-बनाया काम बिगड़ना ही चाहता है। कुछ उपाय करते नहीं बनता। तब 

अयोध्याकाण्ड दोहा 264

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चौपाई :कहउँ सुभाउ सत्य सिव साखी। भरत भूमि रह राउरि राखी॥तात कुतरक करहु जनि जाएँ। बैर पेम नहिं दुरइ दुराएँ॥1॥ भावार्थ:- हे भरत! मैं स्वभाव से ही सत्य कहता हूँ, शिवजी साक्षी हैं, यह पृथ्वी तुम्हारी ही रखी रह रही है। हे तात! तुम व्यर्थ 

अयोध्याकाण्ड दोहा 263

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चौपाई :सुनि अति बिकल भरत बर बानी। आरति प्रीति बिनय नय सानी॥सोक मगन सब सभाँ खभारू। मनहुँ कमल बन परेउ तुसारू॥1॥ भावार्थ:- अत्यन्त व्याकुल तथा दुःख, प्रेम, विनय और नीति में सनी हुई भरतजी की श्रेष्ठ वाणी सुनकर सब लोग शोक में मग्न हो गए, 

अयोध्याकाण्ड दोहा 262

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चौपाई :भूपति मरन प्रेम पनु राखी। जननी कुमति जगतु सबु साखी॥देखि न जाहिं बिकल महतारीं। जरहिं दुसह जर पुर नर नारीं॥1॥ भावार्थ:- प्रेम के प्रण को निबाहकर महाराज (पिताजी) का मरना और माता की कुबुद्धि, दोनों का सारा संसार साक्षी है। माता

अयोध्याकाण्ड दोहा 261

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चौपाई :बिधि न सकेऊ सहि मोर दुलारा। नीच बीचु जननी मिस पारा॥यहउ कहत मोहि आजु न सोभा। अपनीं समुझि साधु सुचि को भा॥1॥ भावार्थ:- परन्तु विधाता मेरा दुलार न सह सका। उसने नीच माता के बहाने (मेरे और स्वामी के बीच) अंतर डाल दिया। यह भी कहना आ

अयोध्याकाण्ड दोहा 260

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चौपाई :सुनि मुनि बचन राम रुख पाई। गुरु साहिब अनुकूल अघाई॥लखि अपनें सिर सबु छरु भारू। कहि न सकहिं कछु करहिं बिचारू॥1॥ भावार्थ:- मुनि के वचन सुनकर और श्री रामचन्द्रजी का रुख पाकर गुरु तथा स्वामी को भरपेट अपने अनुकूल जानकर सारा बोझ 

अयोध्याकाण्ड दोहा 259

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चौपाई :गुर अनुरागु भरत पर देखी। राम हृदयँ आनंदु बिसेषी॥भरतहि धरम धुरंधर जानी। निज सेवक तन मानस बानी॥1॥ भावार्थ:- भरतजी पर गुरुजी का स्नेह देखकर श्री रामचन्द्रजी के हृदय में विशेष आनंद हुआ। भरतजी को धर्मधुरंधर और तन, मन, वचन से अप

अयोध्याकाण्ड दोहा 258

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चौपाई :आरत कहहिं बिचारि न काऊ। सूझ जुआरिहि आपन दाऊ॥सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ॥ नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ॥1॥ भावार्थ:- आर्त (दुःखी) लोग कभी विचारकर नहीं कहते। जुआरी को अपना ही दाँव सूझता है। मुनि के वचन सुनकर श्री रघुनाथजी कहने लगे- हे