Home / Articles / Page / 27

अरण्यकाण्ड दोहा 3

Filed under: Aranyakand
चौपाई :रघुपति चित्रकूट बसि नाना। चरित किए श्रुति सुधा समाना॥बहुरि राम अस मन अनुमाना। होइहि भीर सबहिं मोहि जाना॥1॥ भावार्थ : अमृत के समान (प्रिय) हैं। फिर (कुछ समय पश्चात) श्री रामजी ने मन में ऐसा अनुमान किया कि मुझे सब लोग जान गए है

अरण्यकाण्ड दोहा 02

Filed under: Aranyakand
चौपाई :प्रेरित मंत्र ब्रह्मसर धावा। चला भाजि बायस भय पावा॥धरि निज रूप गयउ पितु पाहीं। राम बिमुख राखा तेहि नाहीं॥1॥ भावार्थ:- मंत्र से प्रेरित होकर वह ब्रह्मबाण दौड़ा। कौआ भयभीत होकर भाग चला। वह अपना असली रूप धरकर पिता इन्द्र के 

अरण्यकाण्ड दोहा 01

Filed under: Aranyakand
चौपाई :पुर नर भरत प्रीति मैं गाई। मति अनुरूप अनूप सुहाई॥अब प्रभु चरित सुनहु अति पावन। करत जे बन सुर नर मुनि भावन॥1॥ भावार्थ:- पुरवासियों के और भरतजी के अनुपम और सुंदर प्रेम का मैंने अपनी बुद्धि के अनुसार गान किया। अब देवता, मनुष्य 

अरण्यकाण्ड शूरूआत श्लोक

Filed under: Aranyakand
श्लोक : मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधेः पूर्णेन्दुमानन्ददंवैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम्‌।मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ स्वःसम्भवं शंकरंवंदे ब्रह्मकुलं कलंकशमनं श्री रामभूपप्रियम्‌॥1॥ भावार्थ:- धर्म रूपी वृक्ष 

अयोध्याकाण्ड दोहा 326

Filed under: Ayodhyakand
चौपाई :पुलक गात हियँ सिय रघुबीरू। जीह नामु जप लोचन नीरू॥लखन राम सिय कानन बसहीं। भरतु भवन बसि तप तनु कसहीं॥1॥ भावार्थ:- शरीर पुलकित है, हृदय में श्री सीता-रामजी हैं। जीभ राम नाम जप रही है, नेत्रों में प्रेम का जल भरा है। लक्ष्मणजी, श्

अयोध्याकाण्ड दोहा 325

Filed under: Ayodhyakand
चौपाई :देह दिनहुँ दिन दूबरि होई। घटइ तेजु बलु मुखछबि सोई॥नित नव राम प्रेम पनु पीना। बढ़त धरम दलु मनु न मलीना॥1॥ भावार्थ:- भरतजी का शरीर दिनों-दिन दुबला होता जाता है। तेज (अन्न, घृत आदि से उत्पन्न होने वाला मेद*) घट रहा है। बल और मुख छबि

अयोध्याकाण्ड दोहा 324

Filed under: Ayodhyakand
चौपाई :राम मातु गुर पद सिरु नाई। प्रभु पद पीठ रजायसु पाई॥नंदिगाँव करि परन कुटीरा। कीन्ह निवासु धरम धुर धीरा॥1॥ भावार्थ:- फिर श्री रामजी की माता कौसल्याजी और गुरुजी के चरणों में सिर नवाकर और प्रभु की चरणपादुकाओं की आज्ञा पाकर धर्

अयोध्याकाण्ड दोहा 323

Filed under: Ayodhyakand
चौपाई :सचिव सुसेवक भरत प्रबोधे। निज निज काज पाइ सिख ओधे॥पुनि सिख दीन्हि बोलि लघु भाई। सौंपी सकल मातु सेवकाई॥1॥ भावार्थ:- भरतजी ने मंत्रियों और विश्वासी सेवकों को समझाकर उद्यत किया। वे सब सीख पाकर अपने-अपने काम में लग गए। फिर छोटे