Home / Articles / Page / 25

अरण्यकाण्ड दोहा 19

Filed under: Aranyakand
चौपाई :प्रभु बिलोकि सर सकहिं न डारी। थकित भई रजनीचर धारी॥सचिव बोलि बोले खर दूषन। यह कोउ नृपबालक नर भूषन॥1॥ भावार्थ:- (सौंदर्य-माधुर्यनिधि) प्रभु श्री रामजी को देखकर राक्षसों की सेना थकित रह गई। वे उन पर बाण नहीं छोड़ सके। मंत्री क

अरण्यकाण्ड दोहा 18

Filed under: Aranyakand
चौपाई :नाक कान बिनु भइ बिकरारा। जनु स्रव सैल गेरु कै धारा॥खर दूषन पहिं गइ बिलपाता। धिग धिग तव पौरुष बल भ्राता॥1॥ भावार्थ:- बिना नाक-कान के वह विकराल हो गई। (उसके शरीर से रक्त इस प्रकार बहने लगा) मानो (काले) पर्वत से गेरू की धारा बह रही

अरण्यकाण्ड दोहा 17

Filed under: Aranyakand
चौपाई :भगति जोग सुनि अति सुख पावा। लछिमन प्रभु चरनन्हि सिरु नावा॥एहि बिधि कछुक दिन बीती। कहत बिराग ग्यान गुन नीती॥1॥ भावार्थ:- इस भक्ति योग को सुनकर लक्ष्मणजी ने अत्यंत सुख पाया और उन्होंने प्रभु श्री रामचंद्रजी के चरणों में सि

अरण्यकाण्ड दोहा 16

Filed under: Aranyakand
चौपाईधर्म तें बिरति जोग तें ग्याना। ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना॥जातें बेगि द्रवउँ मैं भाई। सो मम भगति भगत सुखदाई॥1॥ भावार्थ:- धर्म (के आचरण) से वैराग्य और योग से ज्ञान होता है तथा ज्ञान मोक्ष का देने वाला है- ऐसा वेदों ने वर्णन किया 

अरण्यकाण्ड दोहा 15

Filed under: Aranyakand
चौपाई :थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई। सुनहु तात मति मन चित लाई॥मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया॥1॥ भावार्थ:-(श्री रामजी ने कहा-) हे तात! मैं थोड़े ही में सब समझाकर कहे देता हूँ। तुम मन, चित्त और बुद्धि लगाकर सुनो! मैं और

अरण्यकाण्ड दोहा 14

Filed under: Aranyakand
चौपाई :जब ते राम कीन्ह तहँ बासा। सुखी भए मुनि बीती त्रासा॥गिरि बन नदीं ताल छबि छाए। दिन दिन प्रति अति होहिं सुहाए॥1॥ भावार्थ:- जब से श्री रामजी ने वहाँ निवास किया, तब से मुनि सुखी हो गए, उनका डर जाता रहा। पर्वत, वन, नदी और तालाब शोभा स

अरण्यकाण्ड दोहा 13

Filed under: Aranyakand
चौपाई :तब रघुबीर कहा मुनि पाहीं। तुम्ह सन प्रभु दुराव कछु नाहीं॥तुम्ह जानहु जेहि कारन आयउँ। ताते तात न कहि समुझायउँ॥1॥ भावार्थ:- तब श्री रामजी ने मुनि से कहा- हे प्रभो! आप से तो कुछ छिपाव है नहीं। मैं जिस कारण से आया हूँ, वह आप जानते 

अरण्यकाण्ड दोहा 12

Filed under: Aranyakand
चौपाई :एवमस्तु करि रमानिवासा। हरषि चले कुंभज रिषि पासा॥बहुत दिवस गुर दरसनु पाएँ। भए मोहि एहिं आश्रम आएँ॥1॥ भावार्थ:- ‘एवमस्तु’ (ऐसा ही हो) ऐसा उच्चारण कर लक्ष्मी निवास श्री रामचंद्रजी हर्षित होकर अगस्त्य ऋषि के पास चले। (तब सुती