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किष्किंधाकांड दोहा 28

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चौपाई :अनुज क्रिया करि सागर तीरा। कहि निज कथा सुनहु कपि बीरा॥हम द्वौ बंधु प्रथम तरुनाई। गगन गए रबि निकट उड़ाई॥1॥ भावार्थ:- समुद्र के तीर पर छोटे भाई जटायु की क्रिया (श्राद्ध आदि) करके सम्पाती अपनी कथा कहने लगा- हे वीर वानरों! सुनो, ह

किष्किंधाकांड दोहा 27

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चौपाई :एहि बिधि कथा कहहिं बहु भाँती। गिरि कंदराँ सुनी संपाती॥बाहेर होइ देखि बहु कीसा। मोहि अहार दीन्ह जगदीसा॥1॥ भावार्थ:- इस प्रकार जाम्बवान्‌ बहुत प्रकार से कथाएँ कह रहे हैं। इनकी बातें पर्वत की कन्दरा में सम्पाती ने सुनीं। बा

किष्किंधाकांड दोहा 26

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चौपाई :इहाँ बिचारहिं कपि मन माहीं। बीती अवधि काज कछु नाहीं॥सब मिलि कहहिं परस्पर बाता। बिनु सुधि लएँ करब का भ्राता॥1॥ भावार्थ:- यहाँ वानरगण मन में विचार कर रहे हैं कि अवधि तो बीत गई, पर काम कुछ न हुआ। सब मिलकर आपस में बात करने लगे कि 

किष्किंधाकांड दोहा 25

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चौपाई :दूरि ते ताहि सबन्हि सिरु नावा। पूछें निज बृत्तांत सुनावा॥तेहिं तब कहा करहु जल पाना। खाहु सुरस सुंदर फल नाना॥1॥ भावार्थ:- दूर से ही सबने उसे सिर नवाया और पूछने पर अपना सब वृत्तांत कह सुनाया। तब उसने कहा- जलपान करो और भाँति-भा

किष्किंधाकांड दोहा 24

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चौपाई :कतहुँ होइ निसिचर सैं भेटा। प्रान लेहिं एक एक चपेटा॥बहु प्रकार गिरि कानन हेरहिं। कोउ मुनि मिलइ ताहि सब घेरहिं॥1॥ भावार्थ:- कहीं किसी राक्षस से भेंट हो जाती है, तो एक-एक चपत में ही उसके प्राण ले लेते हैं। पर्वतों और वनों को बह

किष्किंधाकांड दोहा 23

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चौपाई :सुनहु नील अंगद हनुमाना। जामवंत मतिधीर सुजाना॥सकल सुभट मिलि दच्छिन जाहू। सीता सुधि पूँछेहु सब काहू॥1॥ भावार्थ:- हे धीरबुद्धि और चतुर नील, अंगद, जाम्बवान्‌ और हनुमान! तुम सब श्रेष्ठ योद्धा मिलकर दक्षिण दिशा को जाओ और सब किस

किष्किंधाकांड दोहा 22

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चौपाई :बानर कटक उमा मैं देखा। सो मूरुख जो करन चह लेखा॥आइ राम पद नावहिं माथा। निरखि बदनु सब होहिं सनाथा॥1॥ भावार्थ:- (शिवजी कहते हैं-) हे उमा! वानरों की वह सेना मैंने देखी थी। उसकी जो गिनती करना चाहे वह महान्‌ मूर्ख है। सब वानर आ-आकर श्

किष्किंधाकांड दोहा 21

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चौपाई :नाइ चरन सिरु कह कर जोरी॥ नाथ मोहि कछु नाहिन खोरी॥अतिसय प्रबल देव तव माया॥ छूटइ राम करहु जौं दाया॥1॥ भावार्थ:- श्री रघुनाथजी के चरणों में सिर नवाकर हाथ जोड़कर सुग्रीव ने कहा- हे नाथ! मुझे कुछ भी दोष नहीं है। हे देव! आपकी माया अ