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लंका काण्ड दोहा 5

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चौपाई :अस कौतुक बिलोकि द्वौ भाई। बिहँसि चले कृपाल रघुराई॥सेन सहित उतरे रघुबीरा। कहि न जाइ कपि जूथप भीरा॥1॥ भावार्थ:- कृपालु रघुनाथजी (तथा लक्ष्मणजी) दोनों भाई ऐसा कौतुक देखकर हँसते हुए चले। श्री रघुवीर सेना सहित समुद्र के पार 

लंका काण्ड दोहा 4

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चौपाई :बाँधि सेतु अति सुदृढ़ बनावा। देखि कृपानिधि के मन भावा॥चली सेन कछु बरनि न जाई। गर्जहिं मर्कट भट समुदाई॥1॥ भावार्थ:- नल-नील ने सेतु बाँधकर उसे बहुत मजबूत बनाया। देखने पर वह कृपानिधान श्री रामजी के मन को (बहुत ही) अच्छा लगा। 

लंका काण्ड दोहा 3

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चौपाई :जे रामेस्वर दरसनु करिहहिं। ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं॥जो गंगाजलु आनि चढ़ाइहि। सो साजुज्य मुक्ति नर पाइहि॥1॥ भावार्थ:- जो मनुष्य (मेरे स्थापित किए हुए इन) रामेश्वरजी का दर्शन करेंगे, वे शरीर छोड़कर मेरे लोक को जाएँगे और 

लंका काण्ड दोहा 2

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चौपाई :सैल बिसाल आनि कपि देहीं। कंदुक इव नल नील ते लेहीं॥देखि सेतु अति सुंदर रचना। बिहसि कृपानिधि बोले बचना॥1॥ भावार्थ:- वानर बड़े-बड़े पहाड़ ला-लाकर देते हैं और नल-नील उन्हें गेंद की तरह ले लेते हैं। सेतु की अत्यंत सुंदर रचना द

लंका काण्ड दोहा 1

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चौपाई :यह लघु जलधि तरत कति बारा। अस सुनि पुनि कह पवनकुमारा॥प्रभु प्रताप बड़वानल भारी। सोषेउ प्रथम पयोनिधि बारी॥1॥ भावार्थ:- फिर यह छोटा सा समुद्र पार करने में कितनी देर लगेगी? ऐसा सुनकर फिर पवनकुमार श्री हनुमान्‌जी ने कहा- प्र

लंका काण्ड श्लोक

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श्लोक :रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहंयोगीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम्‌।मायातीतं सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्मवृन्दैकदेवंवन्दे कन्दावदातं सरसिजनयनं देवमुर्वीशरूपम्‌॥1॥ भावार्थ:- कामदे

किष्किंधाकांड दोहा 30

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चौपाई :अंगद कहइ जाउँ मैं पारा। जियँ संसय कछु फिरती बारा॥जामवंत कह तुम्ह सब लायक। पठइअ किमि सबही कर नायक॥1॥ भावार्थ:- अंगद ने कहा- मैं पार तो चला जाऊँगा, परंतु लौटते समय के लिए हृदय में कुछ संदेह है। जाम्बवान्‌ ने कहा- तुम सब प्रकार स

किष्किंधाकांड दोहा 29

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चौपाई :जो नाघइ सत जोजन सागर। करइ सो राम काज मति आगर॥मोहि बिलोकि धरहु मन धीरा। राम कृपाँ कस भयउ सरीरा॥1॥ भावार्थ:- जो सौ योजन (चार सौ कोस) समुद्र लाँघ सकेगा और बुद्धिनिधान होगा, वही श्री रामजी का कार्य कर सकेगा। (निराश होकर घबराओ मत) म