लंका काण्ड दोहा 29
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चौपाई :जरत बिलोकेउँ जबहि कपाला। बिधि के लिखे अंक निज भाला॥नर कें कर आपन बध बाँची। हसेउँ जानि बिधि गिरा असाँची॥1॥ भावार्थ:- मस्तकों के जलते समय जब मैंने अपने ललाटों पर लिखे हुए विधाता के अक्षर देखे, तब मनुष्य के हाथ से अपनी मृत्य