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लंका काण्ड दोहा 29

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चौपाई :जरत बिलोकेउँ जबहि कपाला। बिधि के लिखे अंक निज भाला॥नर कें कर आपन बध बाँची। हसेउँ जानि बिधि गिरा असाँची॥1॥ भावार्थ:- मस्तकों के जलते समय जब मैंने अपने ललाटों पर लिखे हुए विधाता के अक्षर देखे, तब मनुष्य के हाथ से अपनी मृत्य

लंका काण्ड दोहा 28

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चौपाई :सठ साखामृग जोरि सहाई। बाँधा सिंधु इहइ प्रभुताई॥नाघहिं खग अनेक बारीसा। सूर न होहिं ते सुनु सब कीसा॥1॥ भावार्थ:- रे दुष्ट! वानरों की सहायता जोड़कर राम ने समुद्र बाँध लिया, बस, यही उसकी प्रभुता है। समुद्र को तो अनेकों पक्षी 

लंका काण्ड दोहा 27

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चौपाई :सुनु रावन परिहरि चतुराई। भजसि न कृपासिंधु रघुराई॥जौं खल भएसि राम कर द्रोही। ब्रह्म रुद्र सक राखि न तोही॥1॥ भावार्थ:- अरे रावण! चतुराई (कपट) छोड़कर सुन। कृपा के समुद्र श्री रघुनाथजी का तू भजन क्यों नहीं करता? अरे दुष्ट! यदि त

लंका काण्ड दोहा 26

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चौपाई :सुनि अंगद सकोप कह बानी। बोलु संभारि अधम अभिमानी॥सहसबाहु भुज गहन अपारा। दहन अनल सम जासु कुठारा॥1॥ भावार्थ:- रावण के ये वचन सुनकर अंगद क्रोध सहित वचन बोले- अरे नीच अभिमानी! सँभलकर (सोच-समझकर) बोल। जिनका फरसा सहस्रबाहु की भु

लंका काण्ड दोहा 25

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चौपाई : :सुनु सठ सोइ रावन बलसीला। हरगिरि जान जासु भुज लीला॥जान उमापति जासु सुराई। पूजेउँ जेहि सिर सुमन चढ़ाई॥1॥ भावार्थ:-(रावण ने कहा-) अरे मूर्ख! सुन, मैं वही बलवान्‌ रावण हूँ, जिसकी भुजाओं की लीला (करामात) कैलास पर्वत जानता है। जिस

लंका काण्ड दोहा 24

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चौपाई :धन्य कीस जो निज प्रभु काजा। जहँ तहँ नाचइ परिहरि लाजा॥नाचि कूदि करि लोग रिझाई। पति हित करइ धर्म निपुनाई॥1॥ भावार्थ:- बंदर को धन्य है, जो अपने मालिक के लिए लाज छोड़कर जहाँ-तहाँ नाचता है। नाच-कूदकर, लोगों को रिझाकर, मालिक का ह

लंका काण्ड दोहा 23

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चौपाई :तुम्हरे कटक माझ सुनु अंगद। मो सन भिरिहि कवन जोधा बद॥तब प्रभु नारि बिरहँ बलहीना। अनुज तासु दुख दुखी मलीना॥1॥ भावार्थ:- अरे अंगद! सुन, तेरी सेना में बता, ऐसा कौन योद्धा है, जो मुझसे भिड़ सकेगा। तेरा मालिक तो स्त्री के वियोग म

लंका काण्ड दोहा 22

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चौपाई :सिव बिरंचि सुर मुनि समुदाई। चाहत जासु चरन सेवकाई॥तासु दूत होइ हम कुल बोरा। अइसिहुँ मति उर बिहर न तोरा॥1॥ भावार्थ:- शिव, ब्रह्मा (आदि) देवता और मुनियों के समुदाय जिनके चरणों की सेवा (करना) चाहते हैं, उनका दूत होकर मैंने कुल क