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लंका काण्ड दोहा 13

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चौपाई :देखु विभीषन दच्छिन आसा। घन घमंड दामिनी बिलासा॥मधुर मधुर गरजइ घन घोरा। होइ बृष्टि जनि उपल कठोरा॥1॥ भावार्थ:- हे विभीषण! दक्षिण दिशा की ओर देखो, बादल कैसा घुमड़ रहा है और बिजली चमक रही है। भयानक बादल मीठे-मीठे (हल्के-हल्के) स

लंका काण्ड दोहा 12

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चौपाई :पूरब दिसि गिरिगुहा निवासी। परम प्रताप तेज बल रासी॥मत्त नाग तम कुंभ बिदारी। ससि केसरी गगन बन चारी॥1॥ भावार्थ:- पूर्व दिशा रूपी पर्वत की गुफा में रहने वाला, अत्यंत प्रताप, तेज और बल की राशि यह चंद्रमा रूपी सिंह अंधकार रूपी 

लंका काण्ड दोहा 11

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चौपाई :इहाँ सुबेल सैल रघुबीरा। उतरे सेन सहित अति भीरा॥सिखर एक उतंग अति देखी। परम रम्य सम सुभ्र बिसेषी॥1॥ भावार्थ:- यहाँ श्री रघुवीर सुबेल पर्वत पर सेना की बड़ी भीड़ (बड़े समूह) के साथ उतरे। पर्वत का एक बहुत ऊँचा, परम रमणीय, समतल औ

लंका काण्ड दोहा 10

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चौपाई :यह मत जौं मानहु प्रभु मोरा। उभय प्रकार सुजसु जग तोरा॥सुत सन कह दसकंठ रिसाई। असि मति सठ केहिं तोहि सिखाई॥1॥ भावार्थ:- हे प्रभो! यदि आप मेरी यह सम्मति मानेंगे, तो जगत्‌ में दोनों ही प्रकार से आपका सुयश होगा। रावण ने गुस्से मे

लंका काण्ड दोहा 9

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चौपाई :कहहिं सचिव सठ ठकुर सोहाती। नाथ न पूर आव एहि भाँती॥बारिधि नाघि एक कपि आवा। तासु चरित मन महुँ सबु गावा॥॥1॥ भावार्थ:- ये सभी मूर्ख (खुशामदी) मन्त्र ठकुरसुहाती (मुँहदेखी) कह रहे हैं। हे नाथ! इस प्रकार की बातों से पूरा नहीं पड़े

लंका काण्ड दोहा 8

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चौपाई :तब रावन मयसुता उठाई। कहै लाग खल निज प्रभुताई॥सुनु तैं प्रिया बृथा भय माना। जग जोधा को मोहि समाना॥1॥ भावार्थ:- तब रावण ने मंदोदरी को उठाया और वह दुष्ट उससे अपनी प्रभुता कहने लगा- हे प्रिये! सुन, तूने व्यर्थ ही भय मान रखा है। 

लंका काण्ड दोहा 7

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चौपाई :नाथ दीनदयाल रघुराई। बाघउ सनमुख गएँ न खाई॥चाहिअ करन सो सब करि बीते। तुम्ह सुर असुर चराचर जीते॥1॥ भावार्थ:- हे नाथ! श्री रघुनाथजी तो दीनों पर दया करने वाले हैं। सम्मुख (शरण) जाने पर तो बाघ भी नहीं खाता। आपको जो कुछ करना चाहिए 

लंका काण्ड दोहा 6

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चौपाई :निज बिकलता बिचारि बहोरी॥ बिहँसि गयउ गृह करि भय भोरी॥मंदोदरीं सुन्यो प्रभु आयो। कौतुकहीं पाथोधि बँधायो॥1॥ भावार्थ:- फिर अपनी व्याकुलता को समझकर (ऊपर से) हँसता हुआ, भय को भुलाकर, रावण महल को गया। (जब) मंदोदरी ने सुना कि प्रभ