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बालकांड दोहा 35

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चौपाई : दरस परस मज्जन अरु पाना। हरइ पाप कह बेद पुराना॥नदी पुनीत अमित महिमा अति। कहि न सकइ सारदा बिमल मति॥1॥भावार्थ:- वेद-पुराण कहते हैं कि श्री सरयूजी का दर्शन, स्पर्श, स्नान और जलपान पापों को हरता है। यह नदी बड़ी ही पवित्र है, इसकी म

बालकांड दोहा 34

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चौपाई :एहि बिधि सब संसय करि दूरी। सिर धरि गुर पद पंकज धूरी॥पुनि सबही बिनवउँ कर जोरी। करत कथा जेहिं लाग न खोरी॥1॥भावार्थ:- इस प्रकार सब संदेहों को दूर करके और श्री गुरुजी के चरणकमलों की रज को सिर पर धारण करके मैं पुनः हाथ जोड़कर सबकी व

बालकांड दोहा 33

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चौपाई :कीन्हि प्रस्न जेहि भाँति भवानी। जेहि बिधि संकर कहा बखानी॥सो सब हेतु कहब मैं गाई। कथा प्रबंध बिचित्र बनाई॥1॥भावार्थ:- जिस प्रकार श्री पार्वतीजी ने श्री शिवजी से प्रश्न किया और जिस प्रकार से श्री शिवजी ने विस्तार से उसका उत्

बालकांड दोहा 32

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चौपाई :रामचरित चिंतामति चारू। संत सुमति तिय सुभग सिंगारू॥जग मंगल गुनग्राम राम के। दानि मुकुति धन धरम धाम के॥1॥भावार्थ:- श्री रामचन्द्रजी का चरित्र सुंदर चिन्तामणि है और संतों की सुबुद्धि रूपी स्त्री का सुंदर श्रंगार है। श्री रा

बालकांड दोहा 31

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चौपाई :तदपि कही गुर बारहिं बारा। समुझि परी कछु मति अनुसारा॥भाषाबद्ध करबि मैं सोई। मोरें मन प्रबोध जेहिं होई॥1॥भावार्थ:- तो भी गुरुजी ने जब बार-बार कथा कही, तब बुद्धि के अनुसार कुछ समझ में आई। वही अब मेरे द्वारा भाषा में रची जाएगी, जि

बालकांड दोहा 30

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चौपाई :जागबलिक जो कथा सुहाई। भरद्वाज मुनिबरहि सुनाई॥कहिहउँ सोइ संबाद बखानी। सुनहुँ सकल सज्जन सुखु मानी॥1॥भावार्थ:- मुनि याज्ञवल्क्यजी ने जो सुहावनी कथा मुनिश्रेष्ठ भरद्वाजजी को सुनाई थी, उसी संवाद को मैं बखानकर कहूँगा, सब सज्ज

बालकांड दोहा 29

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चौपाई :अति बड़ि मोरि ढिठाई खोरी। सुनि अघ नरकहुँ नाक सकोरी॥समुझि सहम मोहि अपडर अपनें। सो सुधि राम कीन्हि नहिं सपनें॥1॥भावार्थ:- यह मेरी बहुत बड़ी ढिठाई और दोष है, मेरे पाप को सुनकर नरक ने भी नाक सिकोड़ ली है (अर्थात नरक में भी मेरे लिए

बालकांड दोहा 28

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चौपाई :भायँ कुभायँ अनख आलस हूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा। करउँ नाइ रघुनाथहि माथा॥1॥॥भावार्थ:- अच्छे भाव (प्रेम) से, बुरे भाव (बैर) से, क्रोध से या आलस्य से, किसी तरह से भी नाम जपने से दसों दिशाओं में कल्याण होत