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बालकांड दोहा 27

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चौपाई :चहुँ जुग तीनि काल तिहुँ लोका। भए नाम जपि जीव बिसोका॥बेद पुरान संत मत एहू। सकल सुकृत फल राम सनेहू॥1॥भावार्थ:- (केवल कलियुग की ही बात नहीं है,) चारों युगों में, तीनों काल में और तीनों लोकों में नाम को जपकर जीव शोकरहित हुए हैं। वेद,

बालकांड दोहा 26

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चौपाई :नाम प्रसाद संभु अबिनासी। साजु अमंगल मंगल रासी॥सुक सनकादि सिद्ध मुनि जोगी। नाम प्रसाद ब्रह्मसुख भोगी॥1॥भावार्थ:- नाम ही के प्रसाद से शिवजी अविनाशी हैं और अमंगल वेष वाले होने पर भी मंगल की राशि हैं। शुकदेवजी और सनकादि सिद्ध, 

बालकांड दोहा 25

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चौपाई :राम सुकंठ बिभीषन दोऊ। राखे सरन जान सबु कोऊ ॥नाम गरीब अनेक नेवाजे। लोक बेद बर बिरिद बिराजे॥1॥भावार्थ:- श्री रामजी ने सुग्रीव और विभीषण दोनों को ही अपनी शरण में रखा, यह सब कोई जानते हैं, परन्तु नाम ने अनेक गरीबों पर कृपा की है। न

बालकांड दोहा 24

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चौपाई :राम भगत हित नर तनु धारी। सहि संकट किए साधु सुखारी॥नामु सप्रेम जपत अनयासा। भगत होहिं मुद मंगल बासा॥1॥भावार्थ:- श्री रामचन्द्रजी ने भक्तों के हित के लिए मनुष्य शरीर धारण करके स्वयं कष्ट सहकर साधुओं को सुखी किया, परन्तु भक्तगण

बालकांड दोहा 23

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चौपाई :अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा॥मोरें मत बड़ नामु दुहू तें। किए जेहिं जुग निज बस निज बूतें॥1॥भावार्थ:- निर्गुण और सगुण ब्रह्म के दो स्वरूप हैं। ये दोनों ही अकथनीय, अथाह, अनादि और अनुपम हैं। मेरी सम्मति में ना

बालकांड दोहा 22

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चौपाई :नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी। बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी॥ब्रह्मसुखहि अनुभवहिं अनूपा। अकथ अनामय नाम न रूपा॥1॥भावार्थ:- ब्रह्मा के बनाए हुए इस प्रपंच (दृश्य जगत) से भलीभाँति छूटे हुए वैराग्यवान्‌ मुक्त योगी पुरुष इस नाम को ही ज

बालकाण्ड दोहा 21

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चौपाई :समुझत सरिस नाम अरु नामी। प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी॥नाम रूप दुइ ईस उपाधी। अकथ अनादि सुसामुझि साधी॥1॥भावार्थ:- समझने में नाम और नामी दोनों एक से हैं, किन्तु दोनों में परस्पर स्वामी और सेवक के समान प्रीति है (अर्थात्‌ नाम और न

बालकाण्ड दोहा 20

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चौपाई :आखर मधुर मनोहर दोऊ। बरन बिलोचन जन जिय जोऊ॥ससुमिरत सुलभ सुखद सब काहू। लोक लाहु परलोक निबाहू॥1॥ भावार्थ:- दोनों अक्षर मधुर और मनोहर हैं, जो वर्णमाला रूपी शरीर के नेत्र हैं, भक्तों के जीवन हैं तथा स्मरण करने में सबके लिए सुलभ और