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बालकाण्ड दोहा 19

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चौपाई :बंदउँ नाम राम रघुबर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को॥बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो। अगुन अनूपम गुन निधान सो॥1॥ भावार्थ:- मैं श्री रघुनाथजी के नाम ‘राम’ की वंदना करता हूँ, जो कृशानु (अग्नि), भानु (सूर्य) और हिमकर (चन्द्रमा) का हेतु अर्

बालकाण्ड दोहा 18

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चौपाई :कपिपति रीछ निसाचर राजा। अंगदादि जे कीस समाजा॥बंदउँ सब के चरन सुहाए। अधम सरीर राम जिन्ह पाए॥1॥ भावार्थ:- वानरों के राजा सुग्रीवजी, रीछों के राजा जाम्बवानजी, राक्षसों के राजा विभीषणजी और अंगदजी आदि जितना वानरों का समाज है, सब

बालकाण्ड दोहा 17

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चौपाई :प्रनवउँ परिजन सहित बिदेहू। जाहि राम पद गूढ़ सनेहू॥जोग भोग महँ राखेउ गोई। राम बिलोकत प्रगटेउ सोई॥1॥ भावार्थ:- मैं परिवार सहित राजा जनकजी को प्रणाम करता हूँ, जिनका श्री रामजी के चरणों में गूढ़ प्रेम था, जिसको उन्होंने योग और भ

बालकाण्ड दोहा 16

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चौपाई :बंदउँ अवध पुरी अति पावनि। सरजू सरि कलि कलुष नसावनि॥प्रनवउँ पुर नर नारि बहोरी। ममता जिन्ह पर प्रभुहि न थोरी॥1॥ भावार्थ:- मैं अति पवित्र श्री अयोध्यापुरी और कलियुग के पापों का नाश करने वाली श्री सरयू नदी की वन्दना करता हूँ। फ

बालकाण्ड दोहा 15

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चौपाई :पुनि बंदउँ सारद सुरसरिता। जुगल पुनीत मनोहर चरिता॥मज्जन पान पाप हर एका। कहत सुनत एक हर अबिबेका॥1॥ भावार्थ:- फिर मैं सरस्वती और देवनदी गंगाजी की वंदना करता हूँ। दोनों पवित्र और मनोहर चरित्र वाली हैं। एक (गंगाजी) स्नान करने और 

बालकाण्ड दोहा 14

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चौपाई :एहि प्रकार बल मनहि देखाई। करिहउँ रघुपति कथा सुहाई॥ब्यास आदि कबि पुंगव नाना। जिन्ह सादर हरि सुजस बखाना॥1॥ भावार्थ:- इस प्रकार मन को बल दिखलाकर मैं श्री रघुनाथजी की सुहावनी कथा की रचना करूँगा। व्यास आदि जो अनेकों श्रेष्ठ कवि

बालकाण्ड दोहा 13

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चौपाई :सब जानत प्रभु प्रभुता सोई। तदपि कहें बिनु रहा न कोई॥तहाँ बेद अस कारन राखा। भजन प्रभाउ भाँति बहु भाषा॥1॥ भावार्थ:- यद्यपि प्रभु श्री रामचन्द्रजी की प्रभुता को सब ऐसी (अकथनीय) ही जानते हैं, तथापि कहे बिना कोई नहीं रहा। इसमें वे

बालकाण्ड दोहा 12

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चौपाई :जे जनमे कलिकाल कराला। करतब बायस बेष मराला॥चलत कुपंथ बेद मग छाँड़े। कपट कलेवर कलि मल भाँड़े॥1॥ भावार्थ:- जो कराल कलियुग में जन्मे हैं, जिनकी करनी कौए के समान है और वेष हंस का सा है, जो वेदमार्ग को छोड़कर कुमार्ग पर चलते हैं, जो क