बालकांड दोहा 43
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चौपाई :आरति बिनय दीनता मोरी। लघुता ललित सुबारि न थोरी॥अदभुत सलिल सुनत गुनकारी। आस पिआस मनोमल हारी॥1॥भावार्थ:- मेरा आर्तभाव, विनय और दीनता इस सुंदर और निर्मल जल का कम हलकापन नहीं है (अर्थात् अत्यंत हलकापन है)। यह जल बड़ा ही अनोखा है