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बालकांड दोहा 43

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चौपाई :आरति बिनय दीनता मोरी। लघुता ललित सुबारि न थोरी॥अदभुत सलिल सुनत गुनकारी। आस पिआस मनोमल हारी॥1॥भावार्थ:- मेरा आर्तभाव, विनय और दीनता इस सुंदर और निर्मल जल का कम हलकापन नहीं है (अर्थात्‌ अत्यंत हलकापन है)। यह जल बड़ा ही अनोखा है

बालकांड दोहा 42

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चौपाई :कीरति सरित छहूँ रितु रूरी। समय सुहावनि पावनि भूरी॥हिम हिमसैलसुता सिव ब्याहू। सिसिर सुखद प्रभु जनम उछाहू॥1॥भावार्थ:- यह कीर्तिरूपिणी नदी छहों ऋतुओं में सुंदर है। सभी समय यह परम सुहावनी और अत्यंत पवित्र है। इसमें शिव-पार्व

बालकांड दोहा 41

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चौपाई :सीय स्वयंबर कथा सुहाई। सरित सुहावनि सो छबि छाई॥नदी नाव पटु प्रस्न अनेका। केवट कुसल उतर सबिबेका॥1॥भावार्थ:- श्री सीताजी के स्वयंवर की जो सुन्दर कथा है, वह इस नदी में सुहावनी छबि छा रही है। अनेकों सुंदर विचारपूर्ण प्रश्न ही इ

बालकांड दोहा 40

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चौपाई :रामभगति सुरसरितहि जाई। मिली सुकीरति सरजु सुहाई॥सानुज राम समर जसु पावन। मिलेउ महानदु सोन सुहावन॥1॥भावार्थ:- सुंदर कीर्ति रूपी सुहावनी सरयूजी रामभक्ति रूपी गंगाजी में जा मिलीं। छोटे भाई लक्ष्मण सहित श्री रामजी के युद्ध का

बालकांड दोहा 39

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चौपाई :जौं करि कष्ट जाइ पुनि कोई। जातहिं नीद जुड़ाई होई॥जड़ता जाड़ बिषम उर लागा। गएहुँ न मज्जन पाव अभागा॥1॥भावार्थ:- यदि कोई मनुष्य कष्ट उठाकर वहाँ तक पहुँच भी जाए, तो वहाँ जाते ही उसे नींद रूपी ज़ूडी आ जाती है। हृदय में मूर्खता रूप

बालकांड दोहा 38

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चौपाई :जे गावहिं यह चरित सँभारे। तेइ एहि ताल चतुर रखवारे॥सदा सुनहिं सादर नर नारी। तेइ सुरबर मानस अधिकारी॥1॥भावार्थ:- जो लोग इस चरित्र को सावधानी से गाते हैं, वे ही इस तालाब के चतुर रखवाले हैं और जो स्त्री-पुरुष सदा आदरपूर्वक इसे सुन

बालकांड दोहा 37

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चौपाई :सप्त प्रबंध सुभग सोपाना। ग्यान नयन निरखत मन माना॥रघुपति महिमा अगुन अबाधा। बरनब सोइ बर बारि अगाधा॥1॥भावार्थ:- सात काण्ड ही इस मानस सरोवर की सुंदर सात सीढ़ियाँ हैं, जिनको ज्ञान रूपी नेत्रों से देखते ही मन प्रसन्न हो जाता है। 

बालकांड दोहा 36

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चौपाई :संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी। रामचरितमानस कबि तुलसी॥करइ मनोहर मति अनुहारी। सुजन सुचित सुनि लेहु सुधारी॥1॥भावार्थ:- श्री शिवजी की कृपा से उसके हृदय में सुंदर बुद्धि का विकास हुआ, जिससे यह तुलसीदास श्री रामचरित मानस का कवि