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बालकांड दोहा 51

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चौपाई :बिष्नु जो सुर हित नरतनु धारी। सोउ सर्बग्य जथा त्रिपुरारी॥खोजइ सो कि अग्य इव नारी। ग्यानधाम श्रीपति असुरारी॥1॥भावार्थ:- देवताओं के हित के लिए मनुष्य शरीर धारण करने वाले जो विष्णु भगवान्‌ हैं, वे भी शिवजी की ही भाँति सर्वज्ञ 

बालकांड दोहा 50

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चौपाई :संभु समय तेहि रामहि देखा। उपजा हियँ अति हरषु बिसेषा ॥भरि लोचन छबिसिंधु निहारी। कुसमय जानि न कीन्हि चिन्हारी॥1॥भावार्थ:- श्री शिवजी ने उसी अवसर पर श्री रामजी को देखा और उनके हृदय में बहुत भारी आनंद उत्पन्न हुआ। उन शोभा के सम

बालकांड दोहा 49

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चौपाई :रावन मरन मनुज कर जाचा। प्रभु बिधि बचनु कीन्ह चह साचा॥जौं नहिं जाउँ रहइ पछितावा। करत बिचारु न बनत बनावा॥1॥भावार्थ:- रावण ने (ब्रह्माजी से) अपनी मृत्यु मनुष्य के हाथ से माँगी थी। ब्रह्माजी के वचनों को प्रभु सत्य करना चाहते हैं

बालकांड दोहा 48

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चौपाई :एक बार त्रेता जुग माहीं। संभु गए कुंभज रिषि पाहीं॥संग सती जगजननि भवानी। पूजे रिषि अखिलेस्वर जानी॥1॥भावार्थ:- एक बार त्रेता युग में शिवजी अगस्त्य ऋषि के पास गए। उनके साथ जगज्जननी भवानी सतीजी भी थीं। ऋषि ने संपूर्ण जगत्‌ के ई

बालकांड दोहा 47

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चौपाई:जैसें मिटै मोर भ्रम भारी। कहहु सो कथा नाथ बिस्तारी॥जागबलिक बोले मुसुकाई। तुम्हहि बिदित रघुपति प्रभुताई॥1॥भावार्थ:- हे नाथ! जिस प्रकार से मेरा यह भारी भ्रम मिट जाए, आप वही कथा विस्तारपूर्वक कहिए। इस पर याज्ञवल्क्यजी मुस्कु

बालकांड दोहा 46

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चौपाई :अस बिचारि प्रगटउँ निज मोहू। हरहु नाथ करि जन पर छोहू॥राम नाम कर अमित प्रभावा। संत पुरान उपनिषद गावा॥1॥भावार्थ:- यही सोचकर मैं अपना अज्ञान प्रकट करता हूँ। हे नाथ! सेवक पर कृपा करके इस अज्ञान का नाश कीजिए। संतों, पुराणों और उपनि

बालकांड दोहा 45

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चौपाई :एहि प्रकार भरि माघ नहाहीं। पुनि सब निज निज आश्रम जाहीं॥प्रति संबत अति होइ अनंदा। मकर मज्जि गवनहिं मुनिबृंदा॥1॥भावार्थ:- इसी प्रकार माघ के महीनेभर स्नान करते हैं और फिर सब अपने-अपने आश्रमों को चले जाते हैं। हर साल वहाँ इसी त

बालकांड दोहा 44

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चौपाई :भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा। तिन्हहि राम पद अति अनुरागा॥तापस सम दम दया निधाना। परमारथ पथ परम सुजाना॥1॥भावार्थ:- भरद्वाज मुनि प्रयाग में बसते हैं, उनका श्री रामजी के चरणों में अत्यंत प्रेम है। वे तपस्वी, निगृहीत चित्त, जितेन