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बालकांड दोहा 59

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चौपाई :नित नव सोचु सती उर भारा। कब जैहउँ दुख सागर पारा॥मैं जो कीन्ह रघुपति अपमाना। पुनि पतिबचनु मृषा करि जाना॥1॥भावार्थ:- सतीजी के हृदय में नित्य नया और भारी सोच हो रहा था कि मैं इस दुःख समुद्र के पार कब जाऊँगी। मैंने जो श्री रघुनाथ

बालकांड दोहा 58

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चौपाई :हृदयँ सोचु समुझत निज करनी। चिंता अमित जाइ नहिं बरनी॥कृपासिंधु सिव परम अगाधा। प्रगट न कहेउ मोर अपराधा॥1॥भावार्थ:- अपनी करनी को याद करके सतीजी के हृदय में इतना सोच है और इतनी अपार चिन्ता है कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। (उन

बालकांड दोहा 57

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चौपाई :तब संकर प्रभु पद सिरु नावा। सुमिरत रामु हृदयँ अस आवा॥एहिं तन सतिहि भेंट मोहि नाहीं। सिव संकल्पु कीन्ह मन माहीं॥1॥भावार्थ:- तब शिवजी ने प्रभु श्री रामचन्द्रजी के चरण कमलों में सिर नवाया और श्री रामजी का स्मरण करते ही उनके मन 

बालकांड दोहा 56

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चौपाई :सतीं समुझि रघुबीर प्रभाऊ। भय बस सिव सन कीन्ह दुराऊ॥कछु न परीछा लीन्हि गोसाईं। कीन्ह प्रनामु तुम्हारिहि नाईं॥1॥भावार्थ:- सतीजी ने श्री रघुनाथजी के प्रभाव को समझकर डर के मारे शिवजी से छिपाव किया और कहा- हे स्वामिन्‌! मैंने कु

बालकांड दोहा 55

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चौपाई :देखे जहँ जहँ रघुपति जेते। सक्तिन्ह सहित सकल सुर तेते॥जीव चराचर जो संसारा। देखे सकल अनेक प्रकारा॥1॥भावार्थ:- सतीजी ने जहाँ-जहाँ जितने रघुनाथजी देखे, शक्तियों सहित वहाँ उतने ही सारे देवताओं को भी देखा। संसार में जो चराचर जीव 

बालकांड दोहा 54

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चौपाई :मैं संकर कर कहा न माना। निज अग्यानु राम पर आना॥जाइ उतरु अब देहउँ काहा। उर उपजा अति दारुन दाहा॥1॥भावार्थ:- कि मैंने शंकरजी का कहना न माना और अपने अज्ञान का श्री रामचन्द्रजी पर आरोप किया। अब जाकर मैं शिवजी को क्या उत्तर दूँगी? (य

बालकांड दोहा 53

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चौपाई :लछिमन दीख उमाकृत बेषा। चकित भए भ्रम हृदयँ बिसेषा॥कहि न सकत कछु अति गंभीरा। प्रभु प्रभाउ जानत मतिधीरा॥1॥भावार्थ:- सतीजी के बनावटी वेष को देखकर लक्ष्मणजी चकित हो गए और उनके हृदय में बड़ा भ्रम हो गया। वे बहुत गंभीर हो गए, कुछ कह

बालकांड दोहा 52

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चौपाई :जौं तुम्हरें मन अति संदेहू। तौ किन जाइ परीछा लेहू॥तब लगि बैठ अहउँ बटछाहीं। जब लगि तुम्ह ऐहहु मोहि पाहीं॥1॥भावार्थ:- जो तुम्हारे मन में बहुत संदेह है तो तुम जाकर परीक्षा क्यों नहीं लेती? जब तक तुम मेरे पास लौट आओगी तब तक मैं इस