Home / Articles / Page / 105

बालकांड दोहा 67

Filed under: Balkand
चौपाई :कह मुनि बिहसि गूढ़ मृदु बानी। सुता तुम्हारि सकल गुन खानी॥सुंदर सहज सुसील सयानी। नाम उमा अंबिका भवानी॥1॥भावार्थ:- नारद मुनि ने हँसकर रहस्ययुक्त कोमल वाणी से कहा- तुम्हारी कन्या सब गुणों की खान है। यह स्वभाव से ही सुंदर, सुशी

बालकांड दोहा 66

Filed under: Balkand
चौपाई :सरिता सब पुनीत जलु बहहीं। खग मृग मधुप सुखी सब रहहीं॥सहज बयरु सब जीवन्ह त्यागा। गिरि पर सकल करहिं अनुरागा॥1॥भावार्थ:- सारी नदियों में पवित्र जल बहता है और पक्षी, पशु, भ्रमर सभी सुखी रहते हैं। सब जीवों ने अपना स्वाभाविक बैर छोड

बालकांड दोहा 65

Filed under: Balkand
चौपाई :समाचार सब संकर पाए। बीरभद्रु करि कोप पठाए॥जग्य बिधंस जाइ तिन्ह कीन्हा। सकल सुरन्ह बिधिवत फलु दीन्हा॥1॥भावार्थ:- ये सब समाचार शिवजी को मिले, तब उन्होंने क्रोध करके वीरभद्र को भेजा। उन्होंने वहाँ जाकर यज्ञ विध्वंस कर डाला औ

बालकांड दोहा 64

Filed under: Balkand
चौपाई :सुनहु सभासद सकल मुनिंदा। कही सुनी जिन्ह संकर निंदा॥सो फलु तुरत लहब सब काहूँ। भली भाँति पछिताब पिताहूँ॥1॥भावार्थ:- हे सभासदों और सब मुनीश्वरो! सुनो। जिन लोगों ने यहाँ शिवजी की निंदा की या सुनी है, उन सबको उसका फल तुरंत ही मिले

बालकांड दोहा 63

Filed under: Balkand
चौपाई :पिता भवन जब गईं भवानी। दच्छ त्रास काहुँ न सनमानी॥सादर भलेहिं मिली एक माता। भगिनीं मिलीं बहुत मुसुकाता॥1॥भावार्थ:- भवानी जब पिता (दक्ष) के घर पहुँची, तब दक्ष के डर के मारे किसी ने उनकी आवभगत नहीं की, केवल एक माता भले ही आदर से मि

बालकांड दोहा 62

Filed under: Balkand
चौपाई :कहेहु नीक मोरेहूँ मन भावा। यह अनुचित नहिं नेवत पठावा॥दच्छ सकल निज सुता बोलाईं। हमरें बयर तुम्हउ बिसराईं॥1॥भावार्थ:- शिवजी ने कहा- तुमने बात तो अच्छी कही, यह मेरे मन को भी पसंद आई पर उन्होंने न्योता नहीं भेजा, यह अनुचित है। दक

बालकांड दोहा 61

Filed under: Balkand
चौपाई :किंनर नाग सिद्ध गंधर्बा। बधुन्ह समेत चले सुर सर्बा॥बिष्नु बिरंचि महेसु बिहाई। चले सकल सुर जान बनाई॥1॥भावार्थ:- (दक्ष का निमन्त्रण पाकर) किन्नर, नाग, सिद्ध, गन्धर्व और सब देवता अपनी-अपनी स्त्रियों सहित चले। विष्णु, ब्रह्मा औ

बालकांड दोहा 60

Filed under: Balkand
चौपाई :एहि बिधि दुखित प्रजेसकुमारी। अकथनीय दारुन दुखु भारी॥बीतें संबत सहस सतासी। तजी समाधि संभु अबिनासी॥1॥भावार्थ:- दक्षसुता सतीजी इस प्रकार बहुत दुःखित थीं, उनको इतना दारुण दुःख था कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। सत्तासी हजा