बालकांड दोहा 163
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चौपाई :जनि आचरजु करहु मन माहीं। सुत तप तें दुर्लभ कछु नाहीं॥तप बल तें जग सृजइ बिधाता। तप बल बिष्नु भए परित्राता॥1॥भावार्थ:- हे पुत्र! मन में आश्चर्य मत करो, तप से कुछ भी दुर्लभ नहीं है, तप के बल से ब्रह्मा जगत को रचते हैं। तप के ही बल से