Home / Articles / Page / 69

बालकांड दोहा 355

Filed under: Balkand
चौपाई :मंगलगान करहिं बर भामिनि। भै सुखमूल मनोहर जामिनि॥अँचइ पान सब काहूँ पाए। स्रग सुगंध भूषित छबि छाए॥1॥ भावार्थ:- सुंदर स्त्रियाँ मंगलगान कर रही हैं। वह रात्रि सुख की मूल और मनोहारिणी हो गई। सबने आचमन करके पान खाए और फूलों की म

बालकांड दोहा 354

Filed under: Balkand
चौपाई :सब बिधि सबहि समदि नरनाहू। रहा हृदयँ भरि पूरि उछाहू॥जहँ रनिवासु तहाँ पगु धारे। सहित बहूटिन्ह कुअँर निहारे॥1॥ भावार्थ:- सब प्रकार से सबका प्रेमपूर्वक भली-भाँति आदर-सत्कार कर लेने पर राजा दशरथजी के हृदय में पूर्ण उत्साह (आन

बालकांड दोहा 353

Filed under: Balkand
चौपाई :बिनय कीन्हि उर अति अनुरागें। सुत संपदा राखि सब आगें॥नेगु मागि मुनिनायक लीन्हा। आसिरबादु बहुत बिधि दीन्हा॥1॥ भावार्थ:- राजा ने अत्यन्त प्रेमपूर्ण हृदय से पुत्रों को और सारी सम्पत्ति को सामने रखकर (उन्हें स्वीकार करने के 

बालकांड दोहा 352

Filed under: Balkand
चौपाई :जो बसिष्ट अनुसासन दीन्ही। लोक बेद बिधि सादर कीन्ही॥भूसुर भीर देखि सब रानी। सादर उठीं भाग्य बड़ जानी॥1॥ भावार्थ:- वशिष्ठजी ने जो आज्ञा दी, उसे लोक और वेद की विधि के अनुसार राजा ने आदरपूर्वक किया। ब्राह्मणों की भीड़ देखकर अप

बालकांड दोहा 351

Filed under: Balkand
चौपाई :देव पितर पूजे बिधि नीकी। पूजीं सकल बासना जी की॥सबहि बंदि माँगहिं बरदाना। भाइन्ह सहित राम कल्याना॥1॥ भावार्थ:- मन की सभी वासनाएँ पूरी हुई जानकर देवता और पितरों का भलीभाँति पूजन किया। सबकी वंदना करके माताएँ यही वरदान माँगत

बालकांड दोहा 350

Filed under: Balkand
चौपाई :चारि सिंघासन सहज सुहाए। जनु मनोज निज हाथ बनाए॥तिन्ह पर कुअँरि कुअँर बैठारे। सादर पाय पुनीत पखारे॥1॥ भावार्थ:- स्वाभाविक ही सुंदर चार सिंहासन थे, जो मानो कामदेव ने ही अपने हाथ से बनाए थे। उन पर माताओं ने राजकुमारियों और राज

बालकांड दोहा 349

Filed under: Balkand
चौपाई :करहिं आरती बारहिं बारा। प्रेमु प्रमोदु कहै को पारा॥भूषन मनि पट नाना जाती। करहिं निछावरि अगनित भाँती॥1॥ भावार्थ:- वे बार-बार आरती कर रही हैं। उस प्रेम और महान आनंद को कौन कह सकता है! अनेकों प्रकार के आभूषण, रत्न और वस्त्र तथा

बालकांड दोहा 348

Filed under: Balkand
चौपाई :मागध सूत बंदि नट नागर। गावहिं जसु तिहु लोक उजागर॥जय धुनि बिमल बेद बर बानी। दस दिसि सुनिअ सुमंगल सानी॥1॥ भावार्थ:- मागध, सूत, भाट और चतुर नट तीनों लोकों के उजागर (सबको प्रकाश देने वाले परम प्रकाश स्वरूप) श्री रामचन्द्रजी का य