अयोध्याकांड दोहा 17
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Ayodhyakand
चौपाई :सादर पुनि पुनि पूँछति ओही। सबरी गान मृगी जनु मोही॥तसि मति फिरी अहइ जसि भाबी। रहसी चेरि घात जनु फाबी॥1॥ भावार्थ:- बार-बार रानी उससे आदर के साथ पूछ रही है, मानो भीलनी के गान से हिरनी मोहित हो गई हो। जैसी भावी (होनहार) है, वैसी ही