Home / Articles / Page / 67

अयोध्याकांड दोहा 09

Filed under: Ayodhyakand
चौपाई :तब नरनाहँ बसिष्ठु बोलाए। रामधाम सिख देन पठाए॥गुर आगमनु सुनत रघुनाथा। द्वार आइ पद नायउ माथा॥1॥ भावार्थ:- तब राजा ने वशिष्ठजी को बुलाया और शिक्षा (समयोचित उपदेश) देने के लिए श्री रामचन्द्रजी के महल में भेजा। गुरु का आगमन सुन

अयोध्याकांड दोहा 08

Filed under: Ayodhyakand
चौपाई :प्रथम जाइ जिन्ह बचन सुनाए। भूषन बसन भूरि तिन्ह पाए॥प्रेम पुलकि तन मन अनुरागीं। मंगल कलस सजन सब लागीं॥1॥ भावार्थ:- सबसे पहले (रनिवास में) जाकर जिन्होंने ये वचन (समाचार) सुनाए, उन्होंने बहुत से आभूषण और वस्त्र पाए। रानियों का 

अयोध्याकांड दोहा 07

Filed under: Ayodhyakand
चौपाई :जो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा। सो तेहिं काजु प्रथम जनु कीन्हा॥बिप्र साधु सुर पूजत राजा। करत राम हित मंगल काजा॥1॥ भावार्थ:- मुनीश्वर ने जिसको जिस काम के लिए आज्ञा दी, उसने वह काम (इतनी शीघ्रता से कर डाला कि) मानो पहले से ही कर रखा 

अयोध्याकांड दोहा 06

Filed under: Ayodhyakand
चौपाई :हरषि मुनीस कहेउ मृदु बानी। आनहु सकल सुतीरथ पानी॥औषध मूल फूल फल पाना। कहे नाम गनि मंगल नाना॥1॥ भावार्थ:- मुनिराज ने हर्षित होकर कोमल वाणी से कहा कि सम्पूर्ण श्रेष्ठ तीर्थों का जल ले आओ। फिर उन्होंने औषधि, मूल, फूल, फल और पत्र 

अयोध्याकांड दोहा 05

Filed under: Ayodhyakand
चौपाई :मुदित महीपति मंदिर आए। सेवक सचिव सुमंत्रु बोलाए॥कहि जयजीव सीस तिन्ह नाए। भूप सुमंगल बचन सुनाए॥1॥ भावार्थ:- राजा आनंदित होकर महल में आए और उन्होंने सेवकों को तथा मंत्री सुमंत्र को बुलवाया। उन लोगों ने ‘जय-जीव’ कहकर सिर नव

अयोध्याकांड दोहा 04

Filed under: Ayodhyakand
चौपाई :सब बिधि गुरु प्रसन्न जियँ जानी। बोलेउ राउ रहँसि मृदु बानी॥नाथ रामु करिअहिं जुबराजू। कहिअ कृपा करि करिअ समाजू॥1॥ भावार्थ:- अपने जी में गुरुजी को सब प्रकार से प्रसन्न जानकर, हर्षित होकर राजा कोमल वाणी से बोले- हे नाथ! श्री रा

अयोध्याकांड दोहा 03

Filed under: Ayodhyakand
चौपाई :कहइ भुआलु सुनिअ मुनिनायक। भए राम सब बिधि सब लायक॥सेवक सचिव सकल पुरबासी। जे हमार अरि मित्र उदासी॥1॥ भावार्थ:- राजा ने कहा- हे मुनिराज! (कृपया यह निवेदन) सुनिए। श्री रामचन्द्रजी अब सब प्रकार से सब योग्य हो गए हैं। सेवक, मंत्री, 

अयोध्याकांड दोहा 02

Filed under: Ayodhyakand
चौपाई :एक समय सब सहित समाजा। राजसभाँ रघुराजु बिराजा॥सकल सुकृत मूरति नरनाहू। राम सुजसु सुनि अतिहि उछाहू॥1॥ भावार्थ:- एक समय रघुकुल के राजा दशरथजी अपने सारे समाज सहित राजसभा में विराजमान थे। महाराज समस्त पुण्यों की मूर्ति हैं, उन